Tuesday, August 16, 2022

हार्ड डिस्क और उसकी तकनीक (HARD DISK & ITS TECHNIQUE)

हार्ड डिस्क और उसकी तकनीक 



सेकेंड्री स्टोरेज़ के तौर पर यह सबसे भरोसेमंद उपकरण है। हम जो भी सॉफ्टवेयर इस्तेमाल करते हैं उन्हें हार्डडिस्क में ही इंस्टॉल करते हैं। आज के पीसी में 100 गेगाबाइट क्षमता वाली हार्डडिस्क का इस्तेमाल आम हो चला है। इस अध्याय में आपको हार्डडिस्क की तकनीक, उसके संदर्भ में इस्तेमाल होने वाले केबल और कनेक्टर, हार्डडिस्क इंस्टॉलेशन इत्यादि की व्यापक जानकारी प्राप्त होगी। इसके अलावा हार्डडिस्क के संबंध में आने वाली समस्याओं का समाधान भी इस अध्याय से सीख सकेंगे। 

इस अध्याय में आप पढ़ेंगे :

  •  हार्ड डिस्क की तकनीक
  •  हार्ड डिस्क कनेक्टर और केबल
  •  हार्ड डिस्क ड्राइव कॉन्फीगुरेशन। 
  • स्केजी ड्राइव और इंटरफेस। 
  •  हार्ड डिस्क ट्रबलशूटिंग । 
  •  हार्ड डिस्क फॉरमेट करना ।

HARD DISK DRIVE


हार्ड डिस्क ड्राइव और उसकी तकनीक (Hard Disk Drive Technology)

 हार्ड ड्राइव के तहत सबसे पहले हार्ड डिस्क का नाम आता है। हार्ड डिस्क को कंप्यूटर में जिस तकनीक के द्वारा जोड़ा जाता रहा है उसे आईडीई (IDE) कहते हैं। आईडीई (IDE) का पूरा नाम है इंटीग्रेटेड ड्राइव इलेक्ट्रॉनिक। इस तकनीक की वजह से हम एक हार्ड डिस्क को पीसी में जोड़कर डेटा स्टोर करने के लिए इस्तेमाल कर पाते हैं। आईडीई (IDE) का वास्तविक नाम होता है ATA जिसका कि फुलफॉर्म अर्थात संपूर्ण नाम है AT अटैचमेंट। इस तकनीक का विकास 1984 के समय में आईबीएम (IBM) कंपनी में हुआ था और AT कंप्यूटरों में इसकी वजह से हार्डडिस्क को लगाना संभव हुआ। 

 इसके पहले आईएएस (IAS) बस का इस्तेमाल इस कार्य के लिए होता था। आईएएस (IAS) बस का पूरा नाम है इंडस्ट्री आर्चीटेक्स्टर | आईडीई (IDE) शब्द का विकास वास्तव में मार्केटिंग डिपार्टमेंट के द्वारा किया गया ।
 आज के समय में इस तकनीक का इस्तेमाल न केवल हार्डडिस्क को पीसी में जोड़ने के लिए होता है बल्कि सीडी-रोम ड्राइव, सीडीआरडब्ल्यू ड्राइव और डीवीडी ड्राइव के अलावा उच्च क्षमता वाली सुपर डिस्क फ्लॉपी ड्राइव और टेप ड्राइवों को भी इसके द्वारा कंप्यूटरों में जोड़ा जाता है। 
में निम्न प्रकार के हार्डडिस्क इंटरफेसों को पिछले कुछ समय से पीसी में इस्तेमाल होता चला आ रहा है 
  • इनमें पहले इंटरफेस का नाम है ST 506/412 इस इंटरफेस को सन् 1978 से लेकर 1979 तक इस्तेमाल किया जाता रहा । 
  • इसके पश्चात नंबर आता है ESDI इस इंटरफेस को 1983 से लेकर 1991 तक इस्तेमाल किया गया। अगला नंबर है SCI जैसे कि आम बोलचाल की भाषा में स्कैजी इंटरफेस कहते हैं को 1986 से लेकर आज तक इस्तेमाल किया जा रहा है।
  •  स्कैजी के बाद नंबर आता है ATA | जिसे कि हम आईडीई के नाम से जानते हैं। इसका प्रयोग भी 1986 से लेकर अब तक होता चला आ रहा है।

सबसे अंत में नंबर आता है सीरियल ATA का। जिसका विकास सन् 2000 में हुआ और इसे आज तक प्रयोग किया जा रह है। 
ATA के तहत 16 बिट पैरलल इंटरफेस का प्रयोग होता है या हम यह कह सकते हैं कि ATA 16 बिट पैरलल इंटरफेस है। इसका मतलब होता है कि इसमें एक समय में 16 बिट डेटा ट्रांसमिट हो सकता है। इसके अंतर्गत एक चौड़ी केबल का इस्तेमाल होता है। → 
  •  इसके पश्चात बनी एक नई इंटरफेस जिसे सीरियल ATA कहा जाता है को आधिकारिक तौर पर सन् 2000 के अंत में प्रस्तुत किया गया था और इसे कंप्यूटरों में सन् 2001 में अपनाया गया। यह सीरियल ATA जैसे कि STA कहते हैं। एक बिट डाउन केबल का इस्तेमाल करते हो जिसकी वजह से थिनर और छोटी अर्थात छोटी केबलों के तहत प्रयोग किया जाता है। यह उच्च क्षमता वाली इंटरफेस है। यह अभी एकदम नई इंटरफेस है, धीरे-धीरे लगभग सभी सहायक उपकरण हो सकता है इसके जरिए कंप्यूटर से जोड़ें जायें।

प्रारंभ में जिन आईडीई (IDE) ड्राइव्स को कंप्यूटर सिस्टम में प्रयोग किया जाता था उन्हें हार्ड कार्ड के नाम से बुलाया जाता था और इन्हें एक स्लॉट में अकेली इकाई या यूनिट के तौर पर जोड़ा जाता था। लेकिन धीरे-धीरे इसमें बदलाव आया। 
जब 1987 में आईबीएम के द्वारा MCAIDE ड्राइव का विकास हुआ तो इन्हें एक बस एडैप्टर के द्वारा जोड़ा जाने लगा और इनका नाम इंटरपोज़र कार्ड रखा गया। कभी-कभी इन बस एडैप्टर को ऐड इन बोर्ड या एंगल बोर्ड भी कहा गया । 
अभी तक आईडीई IDE बस के जिन संस्करणों का इस्तेमाल हुआ है उनमें पहला नंबर आता है सीरियल AT अटैचमेंट जिसे कि STA का नाम दिया गया है। 
दूसरा नंबर आता है पैरलल AT अटैचमेंट। जिसे ATA या आईडीई कहा जाता है। यह 16 बिट ईजा आईएस पर आधारित होता है। 
इसके अलावा XID तकनीक का इस्तेमाल हुआ जो कि 8 बिट आईएसए पर आधारित है।
इसके बाद MCAIDE का इस्तेमाल हुआ जो कि 16 बिट माइक्रो चैनल पर आधारित था। यहां पर एक और महत्वपूर्ण बात आपके ध्यान में लानी है कि केवल ATAIDE इंटरफेस को इंडस्ट्री के द्वारा स्टैंडर्ड प्रदान किया गया है। 

ATAIO कनेक्टर

 ATAIO कनेक्टर को एटीए आउटपुट इनपुट कनेक्टर भी कहा जाता है। वास्तव में यह ATA इंटरफेस कनेक्टर चालीस पिन पर आधारित कनेक्टर होते हैं और प्रत्येक पिन के बीच दशमलव एक इंच अर्थात 2.54 मिलीमीटर का गैप या स्पेस होता है।




 चित्र में आप देख सकते हैं कि आईडी (IDE) कनेक्टर किस तरह का होता है, उसकी केबल कैसी होती है और हार्ड डिस्क में उसे जिस स्थान पर जोड़ा जाता है वहां पर पिन किस तरह से बने होते हैं।
 

इसके अलावा चित्र में यह भी दर्शाया गया है कि आईडीई (IDE) तकनीक पर आधारित हार्डडिस्क में जब पॉवर केबल को जोड़ा जाता है तो पॉवर केबल का कनेक्टर किस तरह का होता है और उसमें किस रंग की तार में कितना करेंट होता है। 
वास्तव में पॉवर केबल में चार विद्युत आपूर्ति करने वाले तार होते हैं जिसमें लाल रंग के तार में पांच वोल्ट (+5V) करेंट होता है, काले रंग के दो तारों में अर्थ होता है और पीले रंग के तार में प्लस 12 ( + 12V) वोल्ट करेंट होता है।


निम्न चित्र में ATA IDE तकनीक पर आधारित 40 पिन वाले इंटरफेस करेक्टर को डिटेल से प्रस्तुत किया गया है





 इस चित्र में आप देख सकते हैं कि कनेक्टरों की पोज़ीशन क्या है, इसमें ब्लॉक की स्थिति क्या है और 40वें ब्लॉक की पोज़ीशन क्या है? 
आज कल 50 पिन वाले भी एटीए कनेक्टर इस्तेमाल किए जाते हैं। इन्हें वास्तव में ढाई इंच वाली एटीए ड्राइव में प्रयोग किए जाते हैं। निम्न चित्र में इस 50 पिन वाले कनेक्टर की डिटेल को आप ध्यान से देख सकते हैं





एटीआईओ (ATIO) केबल 

एटीए कनेक्टर को मदरबोर्ड और ड्राइव के बीच एक केबल के बीच जोड़ा जाता है। इसे रिबन केबल कहते हैं और यह बस एडेप्टर सर्किट तथा ड्राइव कंट्रोलर के बीच सिगनल को लाने या ले जाने का काम करती है।
 सिगनल में किसी तरह की बाधा न उत्पन्न हो या वह एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने में दुर्बल न हो जाए इस बात को ध्यान में रखने के लिए केबल की लंबाई को 18 इंच से ज्यादा नहीं रखते हैं। मीटर सर्किट से जुड़ता है। ड्राइव से लगाते है। 
जब एटीए (ATA) सिगनल की बात करते हैं तो इसमें 20 नंबर वाली पिन का इस्तेमाल केबल ओरिएंटेशन के लिए होता है और यह इंटरफेस से जुड़ा नहीं होता है। 
यह पिन एटीए (ATA) कनेक्टर से जुड़ी होती है और 20वीं पिन का होल केबल को गलत तरीके से प्लग करने से रोकता है। 

• 39 नंबर का पिन ड्राइव को एक्टिव या स्लीप सिगनल प्रदान करता है। इसका दो उद्देश्यों के तहत इस्तेमाल होता है। 
● जब पॉवर ऑन होने के बाद इनीसिलाइजेशन की प्रक्रिया चलती है तो यह सिगनल इस बात को दर्शाता है कि सिगनल को सिस्टम में स्लीप ड्राइव उपस्थित है या नहीं। 
इसके बाद यह सिगनल इस बात को भी पता करता है कि ड्राइव एक्टिव है या नहीं है।
 • एटीए (ATA) सिगनल की यह खूबी पुरानी ड्राइवों में नहीं थी और इसकी वजह से जंपर सेटिंग करके इस कार्य को किया जा सकता था। 
28 नंबर का पिन केबल को स्लेक्ट करने का सिगनल कैरी करता है। जिसे CSEL भी कहते हैं। इस सीएसईएल फंक्शन का सर्वाधिक इस्तेमाल ड्राइव को मास्टर या स्लीप के रूप में स्थापित करके पहचानने के लिए किया जाता है। 
जब ड्राइव CSEL सिगनल को ग्राउंड कर देती है तो वह मास्टर ड्राइव बन जाती है और यदि CSEL • सिगनल खुला है तो वह ड्राइव सव ड्राइव होती है। नीचे दिए हुए चित्र में विस्तार के साथ एटीए (ATA)

आईडी ड्राइव की क्षमता और सीमा 

अब एक नजर एटीए या आईडी ड्राइव की क्षमता और सीमा पर डालते हैं 
  • इसमें सबसे पहला नंबर आता है एटीए- 5 इंटरफेस का । इस इंटरफेस पर आधारित 136.9 जीबी की उच्चतम क्षमता वाली डिस्क का इस्तेमाल हो सकता है। ड्राइव में
  •   इसके पश्चात स्टैंडर्ड CHS बायोस तकनीक का । जिसमें केवल 528 मेगाबाइट की डिस्क को प्रयोग किया जा सकता है। 
  •  इसके पश्चात CHS बायोस विद् ट्रांसलेशन तकनीक का नंबर आता है। 8.4 गेगाबाइट की डिस्क को प्रयोग किया जा सकता है।
  •  अंत में EDD बायोस तकनीक पर आधारित इंटरफेस या ड्राइव का नंबर आता है जिसमें आप 9. 4 जेटाबाइट की ड्राइव का इस्तेमाल कर सकते हैं। एक जेटाबाइट में एक मिलियन ट्रीलियन बाइट्स होती हैं।


सीरियल एटीए (ATA) इंटरफेस 

आइए अब बात करते हैं सीरियल एटीए इंटरफेस की। इस इंटरफेस में आप सामान्य हार्डडिस्क से लेकर सीडी-रोम, सीडी राइटर और डीवीडी ड्राइव के साथ टेप ड्राइव और सुपर डिस्क ड्राइव भी इस्तेमाल कर सकते हैं।
 और उसको वकचोक 46 इसमें डेटा स्थानांतरित करने की गति सौ मेगाबाइट पर सेकेंड से ज्यादा होती है। इसके तहत 15 पिन की पॉवर केबल का इस्तेमाल किया जाता है। इसकी कार्यक्षमता बहुत ही प्रभावी है। वर्तमान समय में इसके इन संस्करणों का इस्तेमाल किया जा रहा है 
 इसके पहले संस्करण का नाम है SATA 150। इसकी बस विथे एक बिट होती है और बस स्पीड 1500 मेगाहर्ट्ज। इसमें डेटा साइकल पर क्लॉक एक है और बैंड विथं 150 मेगाबाइट पर सेकेंड है। 

इसके बाद नंबर आता है STA 300 का यह भी एक बिट बस पर आधारित है लेकिन इसको बस स्पीड 3000 मेगाहर्ट्ज है। इसमें भी डेटा साइकिल ब्लॉक एक हैं। लेकिन 300 मेगाबाइट पर सेकेंड है। 
  • अंत में नंबर आता है SATA 600। एक बिट बस विर्थ पर आधारित यह डेटा साइकिल पर क्लॉक एक है लेकिन इसकी बस स्पीड 6000 मेगाहर्ट्ज और यह एक सेकेंड में 600 मेगाबाइट डेटा ट्रांसफर करने की क्षमता रखती है। इसकी इस क्षमता से आप जरूर ही प्रभावित हुए होंगे। 
जैसा कि अभी आपने जाना कि यह 15 पिन पॉवर केबल और पॉवर कनेक्टर के साथ इस्तेमाल होती है। इसमें 3.3 वोल्ट पॉवर के साथ पांच वोल्ट और 12 वोल्ट अतिरिक्त ऊर्जा को इस्तेमाल किया जाता है। 

निम्न चित्र में केबल पॉवर कनेक्टर और केबल सिगनल कनेक्टर दर्शाया गया है

स्कैजी इंटरफेस 

आम बोलचाल की भाषा में एससीएसआई (SCSI) को स्कैजी इंटरफेस कहा जाता है। इसका पूरा 47 हार्ड डिस्क ड्राइव और उसकी तकनीक BPB ಹಾ तुलना नाम है स्मॉल कंप्यूटर इंटरफेस। इस इंटरफेस पर आधारित हार्डडिस्क आईडीई इंटरफेस की ज्यादा गति से काम करती है। 
सबसे पहले स्कैजी एक नामक संस्करण को बाजार में उतारा गया। यह 8 बिट पैरलल पर आधारित पांच मेगाबाइट की गति से एसिंक्रोनाइज़ और सिंक्रोनाइज़ ऑपरेशन करने में सक्षम था। इसमें चार मेगाबाइट पर सेकेंड की गति से एसिंक्रोनाइज़ और पांच मेगाबाइट की गति से सिंक्रोनाइज़ अवस्था में डेटा ट्रांसफर होता था। इसके तहत 50 पिन की केबल को इस्तेमाल किया जाता रहा और इसमें ऑप्शनल बस पैरिPager इस्तेमा 26 Q+ को इस्तेमाल किया गया।

स्कैजी ड्राइव कान्फगरेशन 

यदि आप कंप्यूटर में स्कैजी ड्राइवों का इस्तेमाल करते हैं तो इसे कॉन्फीगर करना कोई जटिल बात नहीं है। लेकिन यदि इसकी आईडी (IDE) ड्राइव से तुलना करें तो हो सकता है कि आपको कुछ जटिलता महसूस हो। इसे कॉन्फीगर करने के लिए आपको दो या तीन तत्वों को कॉन्फीगर करना पड़ सकता है। वैसे स्कैजी आईडी की सेटिंग बहुत आसान है। 
• आप सात स्कैजी (SCSI) डिवाइसों को एक सिंगल नैरो स्कैजी बस के द्वारा इस्तेमाल कर सकते हैं और 15 डिवाइसों को वाइड बस के द्वारा इस्तेमाल किया जा सकता है। इस तकनीक में प्रत्येक डिवाइस का एक यूनीक स्कैजी आईडी बना होता है । जिस तरह से आईडी डिवाइसों कॉन्फीगर करने के लिए जंपर सेट की जरूरत होती है उसी तरह से स्कैजी आईडी को भी तीन जंपरों से कॉन्फीगर किया जाता है। जंपरों की स्थिति ड्राइव के निर्माता के द्वारा ड्राइव पर तय की जाती है। कई बार यह ड्राइव के पिछले हिस्से में होते हैं और कई बार ड्राइव के अगले हिस्से में होते हैं। दी हुई टेबल में इस जंपर सेटिंग को दर्शाया गया है। यहां पर एक का अर्थ का जंपर का ऑन होना और शून्य का अर्थ है जंपर का ऑफ होना ।

टेबल : SCSI ID टेबल जंपर सेटिंग (लेफ्ट बिट के संदर्भ में) SCSI ID Jumper Setting 0 0 0 1 0 1 2 1 0 1 1 0 0 0 1 1 0 1 1 345 3 4 5 6 7 0 0 0 0 1 1 1 1

 स्कैजी ट्रांसमेशन ट्रबलशूटिंग 

कुछ जब आप स्कैजी बस के तहत कई डिवाइसों के चैन को इंस्टॉल करते हैं तो आपको इसमें जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है। कुछ समस्याएं आपके सामने आ सकती हैं इनको कैसे दूर किया जाए और क्या समस्याएं हो सकती हैं आइए इस पर एक नजर डालें । 

स्कैजी कॉन्फीगरेशन के सबसे पहले आपको यह बात पक्की करनी चाहिए कि आपके मदरबोर्ड में लेटेस्ट बायोस का इस्तेमाल किया गया है या नहीं। 

बायोस बनाने का काम या मदरबोर्ड पर लगाने का काम अनुपेक्चरर अर्थात निर्माता के द्वारा होता है। यदि इसमें लेटेस्ट या नई बायोस नहीं है तो आपको कुछ समस्याएं आ सकती हैं। 
इसके लिये आप यह बात निश्चित करें कि सभी स्कैजी ड्राइव जो आपके कंप्यूटर में जुड़ी हुई हैं वह ऑन हैं या नहीं अर्थात उसमें विद्युत की आपूर्ति हो रही है या नहीं। इसके बाद इस बात की जांच करें कि स्कैजी केबल और पॉवर केबल ठीक तरह से कनेक्ट किए गए हैं या नहीं। यदि यह ठीक तरह से कनेक्ट नहीं हैं तो आप इन्हें रिमूव करके दोबारा से लगाएं। आप होस्ट एडैप्टर जोकि प्रत्येक डिवाइस का अपना होता है और जिसका एक यूनिक स्कैजी आईडी पता होता है उसकी भी जांच करें।

  • यह बात निश्चित करें कि स्कैजी बस ठीक तरह से टर्मिनेट है या नहीं। यहां पर आपको एक बात और याद रखनी होगी कि केवल दो टर्मिनेटर ही बस पर होते हैं और वह भी दोनों सिरों पर एक-एक । इसके अलावा शेष सभी टर्मिनेशन रिमूव और डिसेबल होनी चाहिए। यदि आपके सिस्टम में बायोस सेटअप की सेटिंग पीसीआई बस कॉन्फीगरेशन को नियंत्रित करने की क्षमता रखती है तो आप यह निश्चित करें कि पीसीआई स्लॉट स्कैजी एडेप्टर के तहत एंटण्ट उपलब्ध है या नहीं। 
  • यदि आपके कंप्यूटर में प्लग एंड प्ले की क्षमता है तो आप विंडोज़ का डिवाइस मैनेजर इस्तेमाल करके रिसोर्स के कॉन्फीगरेशन की जांच कर सकते हैं। यह निश्चित करें कि होस्ट एडैप्टर को पीसीआई स्लॉट में इंस्टॉल किया गया है या नहीं। क्योंकि यही बस मास्टरिंग को सपोर्ट करेगा। कई पुराने मदरबोर्ड बस मास्टरिंग को सपोर्ट नहीं करते हैं और यह सभी पीसीआई स्लॉट में काम भी नहीं करते हैं। इसके लिए आप अपने मदरबोर्ड के साथ आए डॉक्यूमेंटेशन को पढ़ें। यदि आपके कंप्यूटर में लगी स्कैजी हार्डडिस्क ठीक से बूट नहीं हो रही है तो इसके यह कारण हो सकते हैं यदि आपके कंप्यूटर में स्कैजी और नॉन स्कैजी दोनों तरह के डिस्क ड्राइवों को इंस्टॉल किया गया है और आप यह चाहते हैं कि वृटिंग का काम स्कैजी ड्राइव से हो तो आप बायोस सेटअप में जाकर बूट सिक्वेंस को कॉन्फीगर करें । यदि आपका सिस्टम इस बात की इजाजत देता है तो आप बूट सिक्वेंस को बदलकर एलाऊ स्कैजी डिवाइस टू बूट फर्स्ट सेट करें। और यदि ऐसा नहीं है तो आप नॉन स्कैजी डिवाइस से ही कंप्यूटर को बूट करना होगा ।

यदि आपके कंप्यूटर में केवल स है तो आप इन तत्वों की जांच करें आपका कंप्यूटर बूट नहीं हो रहा सबसे पहले यह सुनिश्चित करें कि आपके कंप्यूटर की बायोस सेटअप ड्राइव में कॉन्फीगरेशन कहीं नो ड्राइव इंस्टॉल पर तो नहीं है। पीसी बायोस केवल एटीएआईडीई (ATA IDE) ड्राइव को सपोर्ट करके अपना कार्य करती है। इसलिए आप बायोस सेटअप में नो ड्राइव इंस्टॉल को सेट करें। इसके बाद आप कंप्यूटर को दोबारा से स्कैरी ड्राइव के जरिए बूट करें । इस बात को सुनिश्चित करें कि ड्राइव में प्राइमरी पार्टीशन उपलब्ध है या नहीं है इसके लिए आप एफडिस्क (FDISK) जो कि डॉस का कमांड है या विंडोज़ के द्वारा इसकी जांच कर सकते हैं। आप यह जांच करें कि हार्ड डिस्क का वह पार्टीशन जिसमें बूटिंग एरिया है वह एक्टिव है या नहीं। इसे एफडिस्क (FDISK) प्रोग्राम के जरिए जांचा जा सकता है। यदि यह सब करने के बाद भी स्कैजी हार्ड डिस्क बूट नहीं हो रही है तो आप अपने कंप्यूटर के डेटा का बैकअप ले लें और हार्ड डिस्क को लो लेवल फॉर्मेट करें और इसके बाद उसे दोबारा होस्ट एडैप्टर के साथ जोड़ें।


हार्ड डिस्क ड्राइव (HDD)


 हार्ड डिस्क का पूरा नाम हार्ड डिस्क उपकरण का इस्तेमाल होता आ रहा है। इसे नॉन होलेटाइल डेटा स्टोरेज भी कहा जाता है। हार्डडिस्क को वर्तमान समय में प्रमुख डेटा स्टोरेज होता है। पर्सनल कंप्यूटर के अंतर्गसे इस इसमें स्टोर किया गया डेटा बड़ी तेजी से पड़ा जा सकता है। इसमें डेटा स्थानांतरण की गति भी तेज होती है। सामान्य तौर पर हार्डडिस्क चौकोर होती है जब यह अपने प्रारंभिक चरण में दो तो इसकी मोटाई काफी होती थी। लेकिन आज कल इसकी मोटाई मुश्किल से एक इंच होती है और इसे कंप्यूटर में आईडीई या स्केजी कंट्रोलर से जोड़ा जाता है। इसके अंतर्गत डिस्क प्लेटें होती है जो एक माउंटिंग बेचिस पर कसी होती है। इसके सामान्य रिकार्ड प्लेयर की तरह से इसमें जो हैड आम के द्वारा इन डिस्क प्लेटों पर डेटा लिखते है और पड़ते। 


आपने चित्र में जिस हार्ड डिस्क की रेखा चित्र को देखा इसका इस्तेमाल लगभग 20 वर्षों से ज्यादा से पीसी में होता आ रहा है। प्रारंभ में इसकी क्षमता पांच मेगाबाइट हुआ करती थी। कुछ समय पश्चात यह दस मेगाबाइट हुई और यह गेगाबाइट में है। हार्ड डिस्क ड्राइव में जो डिस्क प्लेट होती है उसमें हैड ट्रैक्स और सेक्टर का निर्माण करते हैं जिसकी वजह से उसमें डेटा लिखा जाता है। यह ट्रैक्स दिए हुए चित्र में दर्शाए गए हैं -


 हार्ड डिस्क के ट्रैक्स एक में एक लाख या इससे ज्यादा बाइट डेटा स्टोर किया जा सकता है। हार्ड डिस्क में यह ट्रैक्ट और सेक्टर फॉर्मेट करते समय बनते हैं। • हार्ड डिस्क को फॉमेंट करते समय पहले उसमें पार्टीशन क्रिएट करना पड़ता है। पार्टीशन क्रिएट करने का काम आज से कुछ समय पहले एफ डिस्क कमांड से किया जाता था। इसके पश्चात फॉमेंट कमांड के द्वारा उसे फॉर्मेट करते थे। लेकिन विंडोज़ ऑपरेटिंग सिस्टम के सशक्त होने की वजह से और हाई डिस्क के साथ फॉर्मेटिंग ऑब्जेक्ट आने की वजह से यह काम अब बहुत ही आसान हो गया है और अब कुछ ही सेकेंडों में कई गेगाबाइट की हार्ड डिस्क फॉर्मेट हो जाती है। लेकिन अभी भी एफडिस्क (FDISK) और फॉर्मेट (FORMAT) जैसे कमांडों की उपयोगिता बरकरार है और बहुत सी परिस्थितियों में इन दोनों के द्वारा आज भी यह काम किया जाता है। जब हम हार्ड डिस्क की फॉर्मेटिंग की बात करते हैं तो हार्ड डिस्क को दो तरह से फॉर्मेट किया जाता है। पहले तरह की फॉर्मेटिंग को फिजिकल या लो लेवल फॉर्मेटिंग कहते हैं और दूसरे तरह की फॉर्मेटिंग को लॉजिकल या हाई लेवल फॉर्मेटिंग कहा जाता है। जब आप एक खाली फ्लॉपी डिस्क को फॉर्मेट करते हैं तो डॉस के फॉर्मेट कमांड के द्वारा यह काम किया जाता है। लेकिन पहली बार फॉर्मेट करते समय डॉस का फॉर्मेट कमांड लो लेवल और हाई लेवल फॉर्मेट जैसे दोनों कार्य एक ही समय में संपन्न करता है। यदि फ्लॉपी डिस्क पहले से फॉर्मेट है तो डॉस हो या विंडो दोनों को फॉर्मेट कमांड केवल हाई लेवल फॉर्मेटिंग का काम करता है। लेकिन हार्ड डिस्क को फॉर्मेट करते समय यह दोनों कार्य अलग-अलग संपन्न होते हैं। 
अलग यदि हम तकनीकी रूप से हार्ड डिस्क की फॉर्मेटिंग रूप पर नजर डालें तो हम पाएंगे यह कार्य तीन चरणों में पूरा होता है → इसमें पहले चरण को LLF तथा लो लेवल फॉर्मेटिंग कहा जाता है। . → दूसरे चरण को पार्टीशनिंग कहा जाता है जिसका अर्थ होता है हार्ड डिस्क में पार्टीशन बनाना। → तीसरे चरण को हाई लेवल फॉर्मेटिंग कहते हैं। जब आप हार्डडिस्क की लो लेवल फॉर्मेटिंग करते हैं तो उस समय फॉर्मेट करने वाला प्रोग्राम डिस्क में ट्रैक और सेक्टर को अलग-अलग विभाजित करता है और इस विभाजन के परिणामस्वरूप इंटर सेक्टर और इंटर ट्रैक गैप डिस्क पर बनता है। डिस्क पर यह काम उसके अंतर्गत लगे हैड करते हैं। यह प्रोग्राम प्रत्येक सेक्टर में डमी वाइट फिल करता है और उसका मान पता लगाता है कि एक सेक्टर में कितनी बाइट होंगी। इसे आप सेक्टर की टेस्टिंग प्रक्रिया भी समझ सकते हैं ।

अलग यदि हम तकनीकी रूप से हार्ड डिस्क की फॉर्मेटिंग रूप पर नजर डालें तो हम पाएंगे यह कार्य तीन चरणों में पूरा होता है → इसमें पहले चरण को LLF तथा लो लेवल फॉर्मेटिंग कहा जाता है। . → दूसरे चरण को पार्टीशनिंग कहा जाता है जिसका अर्थ होता है हार्ड डिस्क में पार्टीशन बनाना। → तीसरे चरण को हाई लेवल फॉर्मेटिंग कहते हैं। जब आप हार्डडिस्क की लो लेवल फॉर्मेटिंग करते हैं तो उस समय फॉर्मेट करने वाला प्रोग्राम डिस्क में ट्रैक और सेक्टर को अलग-अलग विभाजित करता है और इस विभाजन के परिणामस्वरूप इंटर सेक्टर और इंटर ट्रैक गैप डिस्क पर बनता है। डिस्क पर यह काम उसके अंतर्गत लगे हैड करते हैं। यह प्रोग्राम प्रत्येक सेक्टर में डमी वाइट फिल करता है और उसका मान पता लगाता है कि एक सेक्टर में कितनी बाइट होंगी। इसे आप सेक्टर की टेस्टिंग प्रक्रिया भी समझ सकते हैं ।
लो लेवल फॉर्मेटिंग के बाद अब आते हैं दूसरे चरण पार्टीशिनिंग पर । हार्ड डिस्क में पार्टीशन करके आप उसमें एक फाइल सिस्टम को इंस्टॉल करते हैं। पार्टीशन बनाना प्रत्येक फाइल सिस्टम एक लॉजिकल यूनिट का इस्तेमाल करता है जिसका कलस्टर या एलोकेशन यूनिट कहा जाता है। पीसी में लगने वाली प्रत्येक हार्ड डिस्क कम से कम एक पार्टीशन का होना
 आप इसे बढ़ा कर चार पाटीशन तक ले जा सकते हैं। लेकिन यह इस बात पर निर्भर है कि आप किस तरह का फाइल सिस्टम इस्तेमाल कर रहे हैं। सामान्य रूप से तीन फाइल सिस्टमों को पीसी में ऑपरेटिंग सिस्टम के तहत इस्तेमाल किया जा रहा है पहले फाइल सिस्टम को FAT अर्थात फाइल एलोकेशन यूनिट कहते हैं। यह एक स्टैंडर्ड फाइल सिस्टम है जिसे डॉस विंडोज़ 95, विंडोज़ ME और विंडोज़ एनटी से सपोर्ट किया जाता है। इस तरह के पार्टीशन में फाइल का नाम ग्यारह अक्षरों से तय होता है जिसमें आठ अक्षर फाइल नाम के पहले भाग के लिए और तीन अक्षर उसके विस्तार नाम अर्थात एक्सटेंशन के लिए इस्तेमाल होते हैं। इस काम के लिए एफ डिस्क (FDISK) कमांड का इस्तेमाल होता है। इसके तहत एफ डिस्क कमांड के जरिए प्राइमरी और एक्सटेंडेंड डॉट पार्टीशन बनाया जाता है। ८) इसके बाद नंबर आता है FAT 32 अर्थात फाइल एलोकेशन टेबल 32 बिट | यह एक वैकल्पिक फाइल सिस्टम है जिसे विंडोज़ 95 OSR2, विंडोज़ 98, विंडोज़ ME और विंडोज़ 2000 से सपोर्ट किया जाता है। FAT 32 फाइल सिस्ट 32 बिट की संख्या को कलस्टर के रूप में आईडेंटीफाई करता है और इसकी वजह से इसमें दो टीवी अर्थात 2028 गेगाबाइट हार्ड डिस्क वाली Page स्त18ल कि जा सकता है
  •  तीसरे स्थान पर नंबर आता है एनटीएफएस (NTFS) । जिसे कहते हैं विंडोज़ एनटी फाइल सिस्टम। इस फाइल सिस्टम को विंडोज़ एनटी और 2000 को सपोर्ट करते हैं और इसमें आप किसी भी फाइल का नाम 256 अक्षरों तक लंबा रख सकते हैं। इसमें आप हार्ड डिस्क के 16 पार्टीशन कर सकते हैं। यह फाइल सिस्टम हार्ड डिस्क में अतिरिक्त फाइल सुरक्षा स्तर प्रदान करता है। जोकि FAT के तहत नहीं होते हैं। पार्टीशन करने का यह काम सामन्य तौर पर एफ डिस्क (FDISK) प्रोग्राम को रन करके किया जाता है। जो कि आपके ऑपरेटिंग सिस्टम में आता है। एफ डिस्क (FDISK) कमांड हार्ड डिस्क में वह क्षमता सक्रिय करता है जिसकी वजह से आप उसमें स्टोरेज़ एमाउंट स्पेस को तय करके यह निर्धारित करते हैं कि कितनी क्षमता का कौन-सी पार्टीशन बनाना है। एफ डिस्क (FDISK) कमांड का इस्तेमाल करते समय आपको एक बात ध्यान रखनी है कि इसके द्वारा आप पहले से बने हुए किसी भी पार्टीशन का आकार नहीं बदल सकते हैं। इसका इस्तेमाल करके या तो पहले से बने हुए पार्टीशन को समाप्त किया जा सकता है या फिर ना पार्टीशन बनाया जा है।

लॉजिक बोर्ड

 सभी तरह की हार्ड डिस्क में एक लॉजिक बोर्ड होता है। जिसके बारे में आप पहले भी पढ़ चुके हैं। इस • लॉजिक बोर्ड में ही वह कनेक्टर होता है जहां पर हम केबल को जोड़ते हैं। चाहे एटीए तकनीक पर • आधारित हार्ड डिस्क हो, चाहे स्कैजी तकनीक पर आधारित हार्ड डिस्क हो। लॉजिक बोर्ड आपको सभी में मिलेगा। लॉजिक बोर्ड एक प्रिंटेड सर्किट बोर्ड पर बना हुआ इलेक्ट्रॉनिक सर्किट होता है। इसमें मैकेनिकल असेम्बली नहीं होती है। लेकिन यह मैकेनिकल असेम्बली को नियंत्रित करने की क्षमता रखता है। ज्यादातर अवस्था में खराबी आने पर आप उन लॉजिक बोर्ड को हार्ड डिस्क में बहुत आराम हद तक लॉजिक बोर्ड सभी तरह की हार्ड डिस्क में एक लॉजिक बोर्ड होता है। जिसके बारे में आप पहले भी पढ़ चुके हैं। 
से निकाल कर उसे रिप्लेस कर सकते हैं। यह सामान्य स्क्रू के द्वारा हार्ड डिस्क की चेसिस से कसा • जाता है और इसमें खराबी आने की दशा में इसमें दूसरे लॉजिक बोर्ड से बहुत ही सरलतापूर्वक बदला जा सकता है। 

केबल एंड कनेक्टर 

हार्ड डिस्क को हम केबल और कनेक्टर्स के द्वारा ही कंप्यूटर के मदरबोर्ड इत्यादि से जोड़ते हैं। हार्ड डिस्क में तीन तरह के केबल और कनेक्टर इस्तेमाल किए जाते हैं। । इनमें पहले तरह को इंटरफेस कनेक्टर कहते हैं, दूसरी तरह को पॉवर कनेक्टर और तीसरे को ● ऑप्शनल कनेक्टर कहा जाता है। इंटरफेस कनेक्टर के द्वारा हम हार्ड डिस्क को मदरबोर्ड में लगे आईडीईए या स्कैजी पोर्ट से कनेक्ट करते हैं। यह केवल चालीस पिन या इससे ज्यादा की हो सकती है। इसके बारे में विस्तार से जानकारी अध्याय के प्रारंभ में दी जा चुकी है। पॉवर कनेक्टर के द्वारा हम हार्ड डिस्क में विद्युत पॉवर की आपूर्ति करते हैं और इसके लिए हार्ड डिस्क में एक खांचा बना रहता है जहां पर इस पॉवर कनेक्टर को लगाते हैं। पॉवर कनेक्टर में पांच वोल्ट से लेकर 12 वोल्ट तक करेंट आता है। ऑप्शनल ग्राउंड कनेक्टर के द्वारा हार्ड डिस्क में अर्थिंग को न्यूटल करते हैं ।

भरोसेमंद स्टोरेज़ मीडिया 

हार्ड डिस्क वर्तमान समय में कंप्यूटर में डेटा स्टोरेज़ करने वाला सबसे रिलाइबल माध्यम है। इसकी लाइबिलिटी को वैज्ञानिकों ने एक दर्जा दिया है। इस दर्जे को संक्षेप में स्मार्ट कहा जाता है। स्मार्ट नामक यह दर्जा अंग्रेजी भाषा के SAMRT नामक पांच अक्षरों से मिलकर बना है और इसका पूरा मतलब होता है सेल्फ मॉनटरिंग एनालेसेस एंड रिपोर्टिंग टेक्नालॉजी | इस तकनीक के तहत हार्ड डिस्क अपनी सुरक्षा या देखभाल स्वयं करती है, अपना विश्लेषण स्वयं करती है। यदि कोई खराबी आ रही है तो उसकी सूचना भी कंप्यूटर को खुद देने की क्षमता रखती है। हार्डडिस्क परफॉर्मेंस दूसरे सभी स्टोरेज मीडिया से अधिक होती है। और यदि इसकी कीमत के अनुसार तुलना करें तो भी यह दूसरे मीडिया से सस्ती और रिलाइबल होती है।


हार्ड डिस्क को कंप्यूटर में इंस्टॉल करना 

हार्ड डिस्क को पीसी में लगाने के लिए आप उसे कवर से निकालें । कवर से निकालने के बाद आप उसे हार्ड डिस्क में लेफ्ट और राइट दोनों साइडों में चैक करें कि वहां स्क्रू लगाने के लिए होल है या 65 Al





कंप्यूटर की कई कैबिनेटों में हार्ड डिस्क को लगाने के लिए एक रिमूवएबल ड्राइव केस होता है। जिसे आप कैबिनेट से पूरी तरह से निकाल कर उसमें बहुत आसानी से स्क्रू और स्क्रू ड्राइवर के द्वारा हार्ड डिस्क को कस सकते हैं। दिए हुए चित्र में इस रिमूवएबल केस को दिखाया गया है 
लेकिन यह रिमूवएबल केस केवल उन्हीं कैबिनेटों में मिलेगा जो कुछ महंगी होती हैं।

इसके बाद आप हार्ड डिस्क को उसकी सही जगह पर ले जाकर कस दें। कसने के विशेष स्क्रू का इस्तेमाल होता है जो कि कैबिनेट के साथ ही उपलब्ध होते हैं । जिस समय आप इन स्क्रूज़ को कसें तो इस बात का विशेष ध्यान रखें कि हार्ड डिस्क आप सीधी कस रहे हैं या नहीं। → स्क्रू कसते समय आप उन्हें बहुत ज्यादा टाइट न करें। नहीं तो हार्ड डिस्क पर ज्यादा दबाव पड़ सकता है। इसके बाद आप इंटरफेस केबल को लें और हार्ड डिस्क के बैक साइड में बने हुए कनेक्टर से उसको जोड़ें। कनेक्टर से जोड़ते समय आप इस बात का ध्यान रखें कि कनेक्टर का पिन नंबर एक और केबल का पिन नंबर एक से पूरी तरह से मैच कर रहा है या नहीं । > इसके बाद आप पॉवर सप्लाई का विद्युत आपूर्ति का कनेक्टर लेकर हार्ड डिस्क में उस स्थान पर लगाएं जहां पर इसके लिए जगह बनी है। 
  • विद्युत आपूर्ति कनेक्टर भी एक विशेष खांचे में लगाया जाता है और इसे लगाते समय इस बात का खास ध्यान रखें कि आप कहीं इसे उल्टा न लगा दें। उल्टा लगाने की अवस्था में हार्ड डिस्क पूरी तरह से खराब हो जाएगी। > इसके पश्चात हार्ड डिस्क से जुड़ी इंटरफेस केबल के दूसरे भाग को मदरबोर्ड में लगे आईडीई कनेक्टर से जोड़ दें। को पिन नंबर एक को और पिन नंबर की तरफ ही रखना aar 2
  • इस कनेक्टर को भी जोड़ते समय आपको पिन नंबर एक का आर है। केबल में लाल रंग की पिन की स्थिति को दर्शाता है। लेकिन कुछ केबलें ऐसी हो सकती हैं जिनमें यह रंग न हो। इसलिए आप बहुत ध्यान से कनेक्टर पर पढ़ें कि उसमें एक नंबर की पिन किधर है। > इसके पश्चात कंप्यूटर को ऑन करें और बायोस सेटअप में जाएं और बायोस सेटअप में आपको ऑटो डिटेक्ट हार्ड डिस्क नामक एक विकल्प मिलेगा। इस पर जाकर क्लिक कर दें या एंटर की को दबा दें। एंटर की को दबाते ही मदरबोर्ड स्वयं ही हार्ड डिस्क को खोजेगा, और खोजने के पश्चात उसके पैरामीटर आपके सामने लाएगा। → हार्ड डिस्क के साथ आए मैन्युअल से पैरामीटरों को मिलाएं। यदि ये हार्ड डिस्क की सही क्षमता को दर्शा रहे हैं तो इन्हें स्लेक्ट कर लें। स्लेक्ट करने के बाद आप बायोस के इन पैरामीटरों को सेव करें और वापस आ जाएं। → वापस आने के बाद अब आपको हार्ड डिस्क को फॉर्मेट करना है। हार्ड डिस्क को हार्ड डिस्क के साथ आई यूटीलिटी से भी फॉर्मेट कर सकते हैं। यह यूटीलिटी बड़ी से बड़ी हार्ड डिस्क के
  • केबलों को सेकेंडों में फॉर्मेट करने की क्षमता रखती है। यदि यह यूटलिटा आपके पास नहीं है तो आप एफ डिस्क (FDISK) कमांड का इस्तेमाल कर सकते हैं। 
  •  इसके लिए आप सबसे पहले कंप्यूटर में लगी फ्लॉपी डिस्क ड्राइव के जरिए एक बूटेबल डिस्क के जरिए कंप्यूटर को बूट करें । 
वर्तमान समय में फ्लॉपी डिस्क ड्राइव के स्थान पर सीडी-रोम ड्राइव के द्वारा भी कंप्यूटर को बूट किया जा सकता है और सीडी-रोम से ही एफ डिस्क (FDISK) नामक कमांड का इस्तेमाल किया जा सकता है। → आपके पीसी में इन दोनों ड्राइवों में से जो भी ड्राइव उपलब्ध हो उसके द्वारा आप कंप्यूटर को बूट करके A प्रॉम्प्ट या D प्रॉम्प्ट को लाएं। A प्रॉम्प्ट हमेशा फ्लॉपी डिस्क ड्राइव को दर्शाता है। जबकि D या E या F प्रॉम्प्ट कंप्यूटर में लगी सीडी-रोम ड्राइव या डीवीडी ड्राइव का प्रतिनिधित्व करते हैं। → यदि आपने अपने कंप्यूटर को फ्लॉपी डिस्क ड्राइव के जरिए बूट किया है तो आपके सामने हमेशा A प्रॉम्प्ट आएगा और यह बूटिंग सीडी-रोम के जरिए हुई है तो वहां पर आपको हमेशा D या E दिखाई देगा।
> जब आपका कंप्यूटर इन दोनों में से किसी एक के जरिए बूट हो जाए तो आप उसमें ऑपरेटिंग सिस्टम की डिस्क लगाएं और एफ डिस्क कमांड को चला दें। > जैसे ही एफ डिस्क कमांड क्रियान्वित होगा आपकी हार्ड डिस्क को खोजेगा और उसका विकल्प मीनू आपके सामने आ जाएगा। इस विकल्प मीनू में आपको सबसे पहले पार्टीशन बनाना है। पार्टीशन बनाने के लिए आपको विकल्प एफ डिस्क कमांड के तहत ही मिलेंगे । → यह विकल्प 123 और चार नंबरों के बीच में होते हैं। इन नंबरों से सबसे पहले आप प्राइमरी डॉट पार्टीशन बनाएं। जब आप इस संबंध में विकल्प नंबर को दबाएंगे तो स्क्रीन पर आपके सामने वह स्पेस निर्धारित करने के लिए विकल्प आएगा कि आप हार्ड डिस्क के कितने स्पेस को प्राइमरी डॉस पार्टीशन बनाना चाहते हैं। आप इससे संबंधित विकल्प को चुन लें। इसके पश्चात यदि आप उसमें एक से ज्यादा पार्टीशन बनाना चाहते हैं अर्थात एक ही हार्ड डिस्क को दो या तीन लॉजिकल हार्ड डिस्कों में बांटना चाहते हैं तो आप एक्सटेंडेंड डॉट पार्टीशन करें और जब यह काम पूरा हो जाए तो स्कैप की को दबाकर कंप्यूटर को री-स्टार्ट कर लें।






 पार्टीशन बनने के बाद जब कंप्यूटर दोबारा री-स्टार्ट होगा तो फिर से ए ड्राइव या सीडी-रोम ड्राइव के जरिए ही बूट होगा। > जब यह बूट हो जाए तो आप फॉर्मेट कमांड के जरिए इसे फॉर्मेट करें फॉर्मेट करते समय आपको फॉर्मेट कमांड के साथ स्लैश एस स्विच का इस्तेमाल करना है। जिससे कि हार्ड डिस्क बूटेबल बन सके और बूटिंग का काम हार्ड डिस्क के द्वारा ही संपन्न हो सके।
हार्ड डिस्क जितनी बड़ी होगी उसको फॉर्मेट होने में उतना ही टाइम लगेगा। फॉर्मेट कमांड लगभग प्रत्येक ऑपरेटिंग सिस्टम में होता है। जब हार्ड डिस्क फॉर्मेट हो जाएगी तो आपके सामने लिखा हुआ मैसेज आ जाएगा कि फॉर्मेटिंग कम्पलीट और यह इतनी क्षमता की है इसके बाद आप अपने कंप्यूटर को फिर से ऑफ करके ऑन करें। > अब आप सीडी-रोम फ्लॉपी डिस्क ड्राइव दोनों में से बूटेबल डिस्कों को निकाल दें। इन डिस्कों को निकालने के बाद जब आपका कंप्यूटर फिर से बूट होगा तो वह आपकी हार्ड डिस्क से होगा और आपके सामने ए (A : l>) या डी (D : \>) प्रॉम्प्ट के बजाय सी प्रॉण्ट (C : \>) आएगा। इसका अर्थ है कि आपके कंप्यूटर में हार्ड डिस्क इंस्टॉल हो गई है और अब बूटिंग उसी के द्वारा हो रही है । जब सी प्रॉम्प्ट (C : \>) आपके सामने आ जाए तो आप यहां से अपना काम प्रारंभ कर सकते हैं। इसमें एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर इंस्टॉल कर सकते हैं, ऑपरेटिंग सिस्टम को पूरी तरह से इंस्टॉल कर सकते हैं और डेटा स्टोरेज़ इत्यादि करने का काम भी कर सकते हैं।

  • हार्ड डिस्क को कंप्यूटर में लगाते समय उसे मास्टर और स्लीव जरूर निर्धारित करें। यदि आपके कंप्यूटर में पहले से एक हार्ड डिस्क है और आप दूसरी हार्ड डिस्क लगा रहे हैं तो उसे जंपर सेटिंग के जरिए स्लीव हार्ड डिस्क बना लें और यदि यह पहली हार्ड डिस्क है तो इसे मास्टर हार्ड • डिस्क रहने दें। 69 हार्ड डिस्क ड्राइव और उसकी BPB कंप्यूटर हार्डवेयर कोर्स 
  •  इसके अलावा जब हार्ड डिस्क में बूटिंग सिस्टम इंस्टॉल हो जाए तो बायोस सेटअप में : बूट का सिक्वेंस सी ए सी 2 डी कर लें। जिससे कि कंप्यूटर शीघ्रता से बूट हो सके।

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